अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल – किस शहर में हम अहल-ए-मोहब्बत निकल आये

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सब लोग लिए संग-ए-मलामत निकल आए

किस शहर में हम अहल-ए-मोहब्बत निकल आए

अब दिल की तमन्ना है तो काश यही हो

आँसू की जगह आँख से हसरत निकल आए

हर घर का दिया गुल करो तुम कि जाने

किस बाम से ख़ुर्शीद-ए-क़यामत निकल आए

जो दरपय-ए-पिंदार हैं उन क़त्ल-गहों से

जाँ दे के भी समझो कि सलामत निकल आए

हम-नफ़सो कुछ तो कहो अहद-ए-सितम की

इक हर्फ़ से मुमकिन है हिकायत निकल आए

यारो मुझे मस्लूब करो तुम कि मिरे बाद

शायद कि तुम्हारा क़द-ओ-क़ामत निकल आए

अहमद फ़राज़

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