कहानी – अब और कहने की ज़रूरत नहीं

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अब और कहने की ज़रूरत नहीं

सआदत हसन मंटो

ये दुनिया भी अजीब-ओ-ग़रीब है ख़ासकर आज का ज़माना क़ानून को जिस तरह फ़रेब दिया जाता है, इस के मुताल्लिक़ शायद आप को ज़्यादा इलम ना हो। आजकल क़ानून एक बे-मानी चीज़ बन कर रह गया है । उधर कोई नया क़ानून बनता है, उधर यार लोग उस का तोड़ सोच लेते हैं, इस के इलावा अपने बचाओ की कई सूरतों पैदा कर लेते हैं।

किसी अख़बार पर आफ़त आनी हो तो आया करे, उस का मालिक महफ़ूज़-ओ-मामून रहेगा, इस लिए कि प्रिंट लाईन में किसी कसाई या धोबी का नाम बहैसियत प्रिंटर पब्लिशर और ऐडीटर के दर्ज होगा । अगर अख़बार में कोई ऐसी तहरीर छप गई जिस पर गर्वनमैंट को एतराज़ हो तो असल मालिक के बजाय वो धोबी या कसाई गिरिफ़्त में आ जाएगा। उस को जुर्माना होगा या क़ैद। जुर्माना तो ज़ाहिर है अख़बार का मालिक अदा कर देगा, मगर क़ैद तो वो अदा नहीं कर सकता। लेकिन इन दो पार्टियों के दरमयान इस क़िस्म का मुआहिदा होता है कि अगर क़ैद हुई तो वो उस के घर इतने रुपय माहवार पहुंचा दिया करेगा। ऐसे मुआहिदे में ख़िलाफ़-वर्ज़ी बहुत कम होती है।

जो लोग नाजायज़ तौर पर शराब बेचते हैं, उन के पास दो तीन आदमी ऐसे ज़रूर मौजूद होते हैं जिन का सिर्फ़ ये काम है कि अगर पुलिस छापा मारे तो वो गिरफ़्तार हो जाएं और चंद माह की क़ैद काट कर वापस आ जाएं इस का मुआवज़ा उन को माक़ूल मिल जाता है।

छापा मारने वाले भी पहले ही से मुत्तला कर देते हैं कि हम आरहे हैं, तुम अपना इंतिज़ाम कर लो चुनांचे फ़ौरन इंतिज़ाम कर लिया जाता है, यानी मालिक ग़ाइब ग़ुल्ला हो जाता है और वो किराए के आदमी गिरफ़्तार हो जाते हैं ये भी एक क़िस्म की मुलाज़मत है लेकिन दुनिया में जितनी मुलाज़मतें हैं कुछ इसी क़िस्म की होती हैं।

मैं जब अमीन पहलवान से मिला तो वो तीन महीने की क़ैद काट कर वापस आया था। मैंने उस से पूछा : “अमीन! इस दफ़ा कैसे जेल में गए?”

अमीन मुस्कुराया: “अपने कारोबार के सिलसिले में”

“क्या कारोबार था?”

“जो रहा, वो है।”

“भई बताओ तो ”

“बताने की क्या ज़रूरत है आप अच्छी तरह जानते हैं मगर ख़्वाह-मख़्वाह मुझ से पूछ रहे हैं।”

मैंने थोड़े से तवक्कुफ़ के बाद इस से कहा “अमीन! तुम्हें आए दिन जेल में जाना क्या पसंद है?”

अमीन पहलवान मुस्कुराया: “जनाब पसंद और न पसंद का सवाल ही पैदा नहीं होता लोग मुझे पहलवान कहते हैं हालाँकि मैंने आज तक अखाड़े की शक्ल नहीं देखी अन-पढ़ हूँ कोई और हुनर भी मुझे नहीं आता बस, जेल जाना आता है। वहां मैं ख़ुश रहता हूँ मुझे कोई तकलीफ़ महसूस नहीं होती आप हर रोज़ दफ़्तर जाते हैं

क्या वो जेल नहीं ”

मैं ला-जवाब होगया: “तुम ठीक कहते हो। अमीन लेकिन दफ़्तर जाने वालों का मुआमला दूसरा है लोग उन्हें बुरी निगाहों से नहीं देखते।”

“क्यों नहीं देखते! ज़िला कचहरी के जितने मुंशी और क्लर्क हैं उन्हें कौन अच्छी नज़र से देखता है रिश्वतें लेते हैं झूट बोलते हैं और प्रले दर्जे के मक्कार होते हैं।”

“मुझ में ऐसा कोई ऐब नहीं मैं अपनी रोज़ी बड़ी ईमानदारी से कमाता हूँ।”

मैंने इस से पूछा “किस तरह?”

उस ने जवाब दिया : “इस तरह कि अगर किसी का काम करता हूँ और क़ैद काटता हूँ जेल में मेहनत मशक़्क़त करता हूँ और बाद में उस शख़्स से जिस की ख़ातिर मैंने सज़ा भुगती थी, मुझे दो तीन सौ रुपया मिलता है तो ये मेरा मुआवज़ा है, इस पर किसी को क्या एतराज़ हो सकता है मैं रिश्वत तो नहीं लेता हलाल की कमाई खाता हूँ। लोग मुझे गुंडा समझते हैं बड़ा ख़तरनाक गुंडा लेकिन मैं आप को बताऊं कि मैंने आज तक किसी के थप्पड़ भी नहीं मारा। मेरी लाईन बिलकुल अलग है ”

उस की लाईन वाक़ई दूसरों से अलग थी मुझे हैरत थी कि तीन चार मर्तबा क़ैद काटने के बावजूद उस में कोई तबदीली वाक़्य नहीं हुई। वो बड़ा संजीदा मगर गंवार क़िस्म का आदमी था जिस को किसी की पर्वा नहीं थी। क़ैद काटने के बाद जब भी आता तो इस का वज़न कम अज़ कम दस पाऊंड ज़्यादा होता।

एक दिन मैंने उस से पूओछा “अमीन क्या वहां का खाना तुम्हें रास आता है?”

उस ने अपने मख़सूस अंदाज़ में जवाब दिया : “खाना कैसा भी हो, उस को रास करना आदमी का अपना काम है मुझे दाल से नफ़रत थी, लेकिन जब पहली मर्तबा मुझे वहां कंकरों भरी दाल दी गई और रेत मिली रोटी तो मैंने कहा अमीन यार ये सब से अच्छा खाना है, खा, डिनर पेल और ख़ुदा का शुक्र बजा ला। चुनांचे मैं एक दो रोज़ ही में आदी होगया मशक़्क़त करता, खाना खाता और यूं महसूस करता जैसे मैंने गंजे के होटल से पेट भर कर खाना खाया है।”

मैंने एक दिन इस से पूछा : “तुम ने कभी किसी औरत से भी मुहब्बत की है?”

उस ने अपने दोनों कान पकड़े “ख़ुदा बचाए इस मुहब्बत से मुझे सिर्फ़ अपनी माँ से मुहब्बत है।”

मैंने उस से पूछा: “तुम्हारी माँ ज़िंदा है?”

“जी हाँ ख़ुदा के फ़ज़्ल-ओ-करम से बहुत बूढ़ी है लेकिन आप की दुआ से उस का साया मेरे सर पर देर तक क़ायम रहेगा और वो तो हर वक़्त मेरे लिए दुआएं मांगती रहती है कि ख़ुदा मुझे नेकी की हिदायत करे ”

मैंने उस से कहा : ख़ुदा तुम्हारी माँ को सलामत रखे! पर मैंने ये पूछा था कि तुम्हें किसी औरत से मुहब्बत हुई या नहीं देखो, झूट नहीं बोलना!”

अमीन पहलवान ने बड़े तेज़ लहजे में कहा : “मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक कभी झूट नहीं बोला मैंने किसी औरत से मुहब्बत नहीं की।”

मैंने पूछा : “क्यों”

उस ने जवाब दिया : “इस लिए कि मुझे उस से दिलचस्पी ही नहीं।”

मैं ख़ामोश हो रहा।

तीसरे रोज़ उस की माँ पर फ़ालिज गिरा और वो राहि-ए-मुल्क-ए-अदम हुई। अमीन पहलवान के पास एक पैसा भी नहीं था। वो सोगवार, मग़्मूम और दिल शिकस्ता बैठा था कि शहर के एक रईस की तरफ़ से उसे बुलावा आया। वो अपनी अज़ीज़ माँ की मय्यत छोड़कर उस के पास गया और उस से पूछा : “क्यों मियां साहब, आप ने मुझे क्यों बुलाया है?”

मियां साहिब ने कहा : “तुम्हें क्यों बुलाया जाता है एक ख़ास काम है”

अमीन ने जिस के दिल-ओ-दिमाग़ में अपनी माँ का कफ़न दफ़न तेर रहा था पूछा: “हुज़ूर ये ख़ास काम क्या है?”

मियां साहब ने सिगरेट सुलगाया : “ब्लैक मार्कीट का क़िस्सा है। मुझे मालूम हुआ है कि आज मेरे गोदामपर छापा मारा जाएगा सो मैंने सोचा कि अमीन पहलवान बेहतरीन आदमी है जो उसे निमटा सकता है।” अमीन ने बड़े मग़्मूम और ज़ख़्मी अंदाज़ में कहा: “आप फ़रमाईए, मैं आप की क्या ख़िदमत कर सकता हूँ?” “भई, ख़िदमत विदमत की बात तुम मत करो बस सिर्फ़ इतनी सी बात है कि जब छापा पड़े तो गोदाम के मालक तुम होगे। गिरफ़्तार हो जाओगे। ज़्यादा से ज़्यादा जुर्माना पाँच हज़ार रुपय होगा और एक दो बरस की क़ैद!” “मुझे क्या मिलेगा?” “जब वहां से रहा हो कर आओगे तो मुआमला तै कर लिया जाएगा।” अमीन ने मियां साहब से कहा : “हुज़ूर, बहुत दूर की बात है जुर्माना तो आप अदा कर देंगे, लेकिन क़ैद तो मुझे काटनी पड़ेगी। आप बाक़ायदा सौदा करें।” मियां साहब मुस्कुराए : “तुम से आज तक मैंने कभी वाअदा ख़िलाफ़ी की है पिछली दफ़ा मैंने तुम से काम लिया और तुम को तीन महीने की क़ैद हुई, तो किया मैंने जेल ख़ाने में हर क़िस्म की सहूलत बहम न पहुंचाई। तुम ने बाहर आकर मुझ से कहा कि तुम्हें वहां कोई तकलीफ़ नहीं थी अगर तुम कुछ अर्से के लिए जेल चले गए तो वहां तुम्हें हर आसाइश होगी।” अमीन ने कहा : “जी ये सब दरुस्त है लेकिन।” “लेकिन क्या?” अमीन की आँखों में आँसू आगए : “मियां साहब! मेरी माँ मर गई है।” “कब?” “आज सुबह।” मियां साहब ने अफ़सोस का इज़हार किया : “कफ़ना दफ़ना दिया होगा। अमीन की आँखों में से आँसू टप टप गिरने लगे मियां साहब अभी तो कुछ भी नहीं हो सका मेरे पास तो अफ़ीम खाने के लिए भी कुछ नहीं है।” मियां साहब ने चंद लमहात हालात पर ग़ौर किया और अमीन से कहा : “तो ऐसा करो मेरा मतलब है कि तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का बंद-ओ-बस्त में अभी किए देता हूँ तुम्हें किसी क़िस्म का तरद्दुद नहीं करना चाहिए तुम गोदाम पर जाओ और अपनी डियूटी सँभालो।” अमीन ने अपनी मैली क़मीस की आसतीन से आँसू पोंछे “लेकिन मियां साहब मैं मैं अपनी माँ के जनाज़े को कंधा भी न दूं!” मियां साहिब ने फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में कहा “ये सब रस्मी चीज़ें हैं, मरहूमा को दफनाना है। सो ये काम बड़ी अच्छी तरह से हो जाएगा तुम्हें जनाज़े के साथ जाने की क्या ज़रूरत है। तुम्हारे साथ जाने से मरहूमा को क्या राहत पहुंचेगी वो तो बेचारी इस दुनिया से रुख़स्त हो चुकी है उस के जनाज़े के साथ कोई भी जाये क्या फ़र्क़ पड़ता है। असल में तुम लोग जाहिल हो मैं अगर मर जाऊं तो मुझे क्या मालूम है कि मेरे जनाज़े में किस किस अज़ीज़ और दोस्त ने शिरकत की थी। मुझे अगर जला भी दिया जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। मेरी लाश को चीलों और गिद्धों के हवाले कर दिया जाये तो मुझे उस की क्या ख़बर होगी। तुम ज़्यादा जज़्बाती न हो, दुनिया में सब से ज़रूरी चीज़ ये है कि अपनी ज़ात के मुतअल्लिक़ सोचा जाये मैं पूछता हूँ, तुम्हारी कमाई के ज़राए क्या हैं ” अमीन सोचने लगा। चंद लम्हात अपनी बिसात के मुताबिक़ ग़ौर करने के बाद उस ने जवाब दिया “हुज़ूर! मेरी कमाई के ज़राए आप को मालूम हैं, मुझ से क्यों पूछते हैं।” “मैंने इस लिए पूछा था कि तुम्हें मेरा काम करने में क्या हियल ओ हुज्जत है। मैं तुम्हारी माँ की तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का अभी बन्द-ओ-बस्त किए देता हूँ, और जब तुम जेल से वापस आओगे तो।” अमीन पहलवान ने बड़े बैंडे अंदाज़ में पूछा “तो आप मेरा भी बन्द-ओ-बस्त कर देंगे।” मियां साहिब बौखला गए : “तुम कैसी बातें करते हो अमीन पहलवान!” अमीन पहलवान ने ज़रा दुरुश्त लहजे में कहा : “अमीन पहलवान की ऐसी की तैसी। आप ये बताईए कि मुझे कितने रुपय मिलेंगे मैं एक हज़ार से कम नहीं लूंगा।” “एक हज़ार तो बहुत ज़्यादा हैं।” अमीन ने कहा : “ज़्यादा है या कम मैं कुछ नहीं जानता मैं जब क़ैद काट कर आऊँगा तो अपनी माँ की क़ब्र पुख़्ता बनाऊंगा, संग-ए-मरमर की वो मुझ से बहुत प्यार करती है।” मियां साहब ने उस से कहा “अच्छा भई, एक हज़ार ही ले लेना।” अमीन ने मियां साहब से कहा : “तो लाईए इतने रुपय दीजिए कि मैं कफ़न दफ़न का इंतिज़ाम कर लूं इस के बाद में आप की ख़िदमत के लिए हाज़िर हो जाऊंगा।” मियां साहब ने अपनी जेब से बटवा निकाला “लेकिन तुम्हारा क्या भरोसा है!” अमीन को यूं महसूस हुआ जैसे उस को किसी ने माँ बहन की गाली दी है। “मियां साहब! आप मुझे बे-ईमान समझते हैं बे-ईमान आप हैं इस लिए कि अपने फ़ेअलों का बोझ मेरे सर पर डाल रहे हैं।” मियां साहि मौक़ा शनास थे। उन्हों ने समझा कि अमीन बिगड़ गया है, चुनांचे उन्हों ने फ़ौरन अपनी चर्ब-ज़बानी से राम करने की कोशिश की लेकिन अमीन पर कोई असर न हुआ। जब वो घर पहुंचा तो देखा कि गुस्साल उसकी माँ को आख़िरी ग़ुस्ल दे चुके हैं। कफ़न भी पहनाया जा चुका है अमीन बहुत मुतहय्यर हुआ कि उस पर ये मेहरबानी किस ने की है मियां साहब ने लेकिन वो तो सौदा करना चाहते थे। उस ने एक आदमी से जो ताबूत को सजाने के लिए फूल गूँध रहा था, पूछा “ये किस आदमी ने इतना एहतिमाम किया है?” फूल वाले ने जवाब दिया : “हुज़ूर! आप की बीवी ने।” अमीन चकरा गया वो अपने शदीद तअज्जुब का मुज़ाहिरा करता मगर ख़ामोश रहा। फूल वाले से सिर्फ़ इतना पूछा “कहाँ हैं वो ” फूल वाले ने जवाब दिया : “जी अन्दर हैं आप का इंतिज़ार कररही थीं ” अमीन अंदर गया तो देखा कि एक नौ-जवान, ख़ूबसूरत लड़की उस की चारपाई पर बैठी है अमीन ने इस से पूछा “आप कौन हैं यहां क्यों आई हैं” उस लड़की ने जवाब दिया “मैं आप की बीवी हूँ यहां क्यों आई हूँ, ये आप का अजीब-ओ-ग़रीब सवाल है।” अमीन ने उस से पूछा : “मेरी बीवी तो कोई भी नहीं। बताओ तुम कौन हो।” लड़की मुस्कुराई : मैं मियां दीन की बेटी हूँ उन से जो आप की गुफ़्तुगू हुई, मैंने सब सुनी और और ” अमीन ने कहा : “अब और कहने की ज़रूरत नहीं ”

 

किताब ‘बगैर इजाज़त’ से

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